आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

खबर ना हो

                
                                                         
                            तेरी बेवफाई की, किसी को खबर ना हो।
                                                                 
                            
ग़म-ए-जुदाई की किसी को खबर ना हो।।

इसीलिए, क़ैद-बाम-ओ-दर हो गया हूं मैं।
मेरी रूस्वाई की, किसी को खबर ना हो।।

घर के सारे चिराग़ों को बुझा दिया हमने।
मेरी परछाई की, किसी को खबर ना हो।।

ऐ बाद-ए-सबा , हिलाना ना घर के परदे।
मेरी तन्हाई की , किसी को खबर ना हो।।

हर बज़्म में जाना अब छोड़ दिया हमने।
यूं शनासाई की, किसी को खबर ना हो।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
50 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर