हिज़्र-ओ-वस्ल के सिलसिले चलेंगे कब तक।
बता,यूं ही हम ये अपने हाथ मलेंगे कब तक।।
एक मुद्दत हो गयी है हमें उम्मीद करते-करते।
ये उम्मीदों के चिराग , यूं ही जलेंगे कब तक।।
-यूनुस खान
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