जब-जब तेरी गली से निकला हूं मैं।
संभलते-संभलते भी फिसला हूं मैं।।
सर-ए-राह, छोड़ कर चले गये मुझे।
वो सब जिनके भी साथ चला हूं मैं।।
मुद्दतों पुरानी अदावत, आज भी है।
चिराग़ों की जगह, खुद जला हूं मैं।।
घर छोड़ने का मुझको शौक न था।
वो दौर, जबकि सबको खला हूं मैं।।
-यूनुस खान
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