उनका गिला-शिकवा भी, इल्ज़ाम ही तो है।
ये ख़ामोशी भी उनकी,एक पैग़ाम ही तो है।।
साकी, ये समझाने की कोशिश कर रहा है।
अश्कों का हो कि मय का , जाम ही तो है।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X