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एक बज़्म सजाते हैं,वीरानों के दरम्यां।

                
                                                         
                            एक बज़्म सजाते हैं,वीरानों के दरम्यां।
                                                                 
                            
कश्ती उतारते हैं,यूं तूफ़ानों के दरम्यां।।

सफ़र ने, मुझे मुसाफ़िर बना ही दिया।
घर ढूंढ रहा हूं,नये ठिकानों के दरम्यां।।

हवाओं का रुख देखकर, सोचा हमने।
एक शम्मा जलायें,परवानों के दरम्यां।।

मेरी अयादत को आओ तो पता चले।
कुछ नये जख़्म हैं , पुरानों के दरम्यां।।

तपते हुए लबों को लेकर,कहां जाऊं।
सब अजनबी हैं, मयखानों के दरम्यां।।
-यूनुस खान
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एक दिन पहले

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