मिलकर इन ख़ामोशियों को ज़बान देते हैं।
यूं सहरा के मुसाफ़िर को, सायबान देते हैं।।
एक मुद्दत हुई है परिंदों को कैद हुए घर में।
चलो अब इनके परों को नयी उड़न देते हैं।।
-यूनुस खान
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