देखा,और फिर दरकिनार करके चल दिये।
यूं सब अरमां , ख़ाकसार करके चल दिये।।
जाने का कोई सबब बताते, तो अच्छा था।
बस नाराज़ी का इज़हार करके, चल दिये।।
हम तो अच्छे खोये थे,खुद माज़ी में अपने।
इस बेखुदी से हमे, बेदार करके चल दिये।।
फिर मिलने का कोई वादा किया ही नहीं।
तंज़ कसा, और इनकार करके चल दिये।।
पहले तो, उस पार से, इस पार लाये हमें।
फिर,अकेले दरिया पार करके चल दिये।।
ब-वक्त-ए-रुखस्ती लब पे जुंबिश न थी।
यूं ख़ामोशी से, संगसार करके चल दिये।।
ये दामन साफ है , पर दाग़दार लगता है।
यूं, रुस्वा सर-ए-बाज़ार करके चल दिये।।
जहां की थीं , प्यार-ओ-खुलूश की बातें।
क्यूं,तुम वीरां वो दयार करके चल दिये।।
ख़ुशबू के लिए,फूलों को मसल देते हो।
क्यूं कलियों को, खार करके चल दिये।।
हमने सोचा था , अयादत को आये हो।
मगर, तुम हमें बीमार करके चल दिये।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X