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बिन रहबर

                
                                                         
                            बिन रहबर , और बिन हमसफ़र चले।
                                                                 
                            
मालूम नहीं हमें, हम किस डगर चले।।

सहरा में, सायबान मिल सके हमको।
इसलिए तो, मेरे संग-संग शजर चले।।

हर सिम्त, हद-ए-निगाह तक जायेंगे।
हम , गांव-गांव और नगर-नगर चले।।

गली-गली तुझको तलाश करेंगे हम।
तेरी ही जुस्तजू में, यूं दर-ब-दर चले।।

कब कौन किस-किस वादे से मुकरा।
हम इन सबको, करके दरगुज़र चले।।

काफिलों के तौर-तरीके पता नहीं हैं।
देखो,जानिब-ए-मंजिल,बेख़बर चले।।
-यूनुस खान
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33 मिनट पहले

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