जिंदगी में शायद इम्तिहान बहुत थे।
राह में, मंज़िलों के निशान बहुत थे।।
हिज़्र का सुरूर था , पता नहीं चला।
वरना तो सब रास्ते, वीरान बहुत थे।।
एक अदद गमख्वार मिला नहीं हमें।
कहने को , शहर में इंसान बहुत थे।।
वो चेहरे पे लिखी इबारत, पढ़ लेते।
बहते अश्कों के,यूं निशान बहुत थे।।
हम चाहकर भी , उनसे दूर ना हुए।
अगरचे यूं फांसले दरम्यान बहुत थे।।
-यूनुस खान
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