साफ़गोई को वो मेरी अना समझता है।
नादां है, ख़ामोशी को मना समझता है।।
मेरे तसव्वुर में आज भी उभरता है वो।
जबकि वो सब कुछ फना समझता है।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X