दास्तां-ओ-फसाने पर एतबार किसे है।
इस दर्द-ओ-गम से , सरोकार किसे है।।
ये अयादत तो महज़ एक रस्म है जैसे।
सवाल ये है,मेरी पीर से प्यार किसे है।।
बिन मयकशी भी, सब नशे में हैं यहां।
मगर, सुरूर किसे है , खुमार किसे है।।
जो हक के साथ मुझ पर हक जताये।
इतना सा हक़-ओ-इख़्तियार किसे है।।
-यूनुस खान
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