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तू सदियों से मुझे छेड़ रहा, मैं भी तुम्हें अब छेड़ती हूँ

2017 National Geographic Nature Photographer of the Year
                
                                                         
                            तू सदियों से मुझे छेड़ रहा, मैं भी तुम्हें अब छेड़ती हूँ
                                                                 
                            
तू पानी का बुलबुला है मानव, मैं तुम्हारी प्रकृति हूँ।।

गर्मी में मच्छरों के रूप में ख़ूब मैं तांडव करती हूँ
पहले कालाज़ार, मलेरिया थी, अब मैं डेंगू बनती हूँ।।

प्रदूषण है सबका दुश्मन, यह बात हमेशा ही कहती हूँ
तू पानी का बुलबुला है मानव, मैं तुम्हारी प्रकृति हूँ।।

बर्षा की बूंदों से अधिक मैं बिजली बन धरा पर गिरती हूं
मिट्टी की प्यास अब नहीं बुझाती, मानव को मैं निगलती हूं।।

ठनका बन मैं तुम्हारे मन का बंद दरवाज़ा खोलती हूं
तू पानी का बुलबुला है मानव, मैं तुम्हारी प्रकृति हूं।।

पिछले कुछ सालों से ठंड में स्वाइन फ़्लू बन आती हूं
प्रकृति पलटवार कर सकती है, घटनाओं से दर्शाती हूं।।

छोटा भाई बन जाओ यदि तुम, मैं बहन बन सकती हूँ
तू पानी का बुलबुला है मानव, मैं तुम्हारी प्रकृति हूँ।।

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8 वर्ष पहले

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