आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिल ने मेरे जो कहा

                
                                                         
                            दिल ने मेरे जो कहा वो तो कभी सुना नहीं
                                                                 
                            
क़ैद भी किया न उसने क़त्ल भी किया नहीं

सजती थी कभी बदन में जिसके अंजुमन मेरी
आज उसकी क़ब्र तक का भी कहीं पता नहीं

मय अगर बहिश्त में परोसती हैं हूर तो
रोज़ी साक़ी की यहाॅं सबाब है ख़ता नहीं

बे-रुख़ी की इंतिहा ही हो गई है इन दिनों
हमने पर उसे कभी भी बेवफ़ा कहा नहीं

हुक्म वो चला रहा यूॅं जैसे हो कोई ख़ुदा
है सुबूत वो बक़ा का मेरी पर ख़ुदा नहीं

लफ़्ज़ सब लबों तलक पहुॅंच ख़ुदी अटक गए
सुनने के लिए कहीं दरीचा था खुला नहीं

शैख़ तू डरा उसे ही कुफ़्र से शराब के
जो ग़म-ए-फ़िराक का कफ़न कभी बना नहीं

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर