दिल ने मेरे जो कहा वो तो कभी सुना नहीं
क़ैद भी किया न उसने क़त्ल भी किया नहीं
सजती थी कभी बदन में जिसके अंजुमन मेरी
आज उसकी क़ब्र तक का भी कहीं पता नहीं
मय अगर बहिश्त में परोसती हैं हूर तो
रोज़ी साक़ी की यहाॅं सबाब है ख़ता नहीं
बे-रुख़ी की इंतिहा ही हो गई है इन दिनों
हमने पर उसे कभी भी बेवफ़ा कहा नहीं
हुक्म वो चला रहा यूॅं जैसे हो कोई ख़ुदा
है सुबूत वो बक़ा का मेरी पर ख़ुदा नहीं
लफ़्ज़ सब लबों तलक पहुॅंच ख़ुदी अटक गए
सुनने के लिए कहीं दरीचा था खुला नहीं
शैख़ तू डरा उसे ही कुफ़्र से शराब के
जो ग़म-ए-फ़िराक का कफ़न कभी बना नहीं
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