मंजिल मेरी कहां है,
राही ये सोचता है।
तूफ़ान से टकराती,
बस नाव देखता है।
आगे बढ़े तो कैसे,
अंधेरे की है आहट।
बिजली यूं कौंधे फिर भी,
मन से जगी है चाहत।
कुछ कर्म और कर ले,
फल को क्यूं देखता है।
मंजिल मेरी कहां है,
राही ये सोचता है।
जी तोड़ नहीं करना,
तो धीरे - धीरे कर ले।
मन से चुनौतियों का,
अब सामना भी कर ले।
तू क्यूं फंसा पड़ा है,
मकसद क्यूं छोड़ता है।
मंजिल मेरी कहां है,
राही ये सोचता है।
घबराया अगर मन से,
कुछ काम नहीं होगा।
पीछे कदम हटे तो
बदनाम तू ही होगा।
कर ले जतन तू थोरा,
क्यूं मन को मोड़ता है।
मंजिल मेरी कहां है,
राही ये सोचता है।
गर ठान लिया तूने,
निश्चय ही वह मिलेगा।
जिसकी तुझे है चाहत,
इक दिन वो गुल खिलेगा।
इस पर भरोसा कर ले,
इत उत क्यूं घूमता है।
मंजिल मेरी कहां है,
राही ये सोचता है।
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