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मैं एक अध्यापक हूँ,

                
                                                         
                            मैं एक अध्यापक हूँ,
                                                                 
                            
सपनों से भरा साधक हूँ,
जितना अपने बच्चों को सिखाऊँ,
उतना ही खुद सीख पाऊँ—
बस इतनी-सी मेरी चाहत है।

मैं क्या कर ही सकता हूँ,
अध्यापक भी हूँ, शिष्य भी हूँ।
सर्वगुण-संपन्न तो नहीं,
पर ज्ञान की खोज में निरंतर हूँ।

ज्ञान का दीप लिए चलता हूँ,
आँधियों से डरता नहीं,
कोशिश करता रहता हूँ—
किसी एक विद्यार्थी की भी
ज़िंदगी की राह उजली कर पाऊँ।

उसे पढ़ने को कहता हूँ,
उसे आगे बढ़ने को कहता हूँ,
पर जब स्वयं न पढ़ पाऊँ,
तो भीतर से एक सवाल उठता है—
“जिस राह पर चलने को कहता हूँ,
क्या स्वयं उस राह पर चलता हूँ?”

यही प्रश्न मेरा गुरु है,
यही मेरा आत्ममंथन है।
मैं शिक्षक हूँ—
पर पूर्ण नहीं हूँ;
मैं विद्यार्थी हूँ—
इसलिए अधूरा होकर भी
हर दिन पूरा होने की कोशिश में हूँ।

मैं निजी शिक्षक हूँ,
मेरे पास कोई विशाल मंच नहीं,
न कोई बड़ी पाठशाला—
बस कुछ सपने हैं,
कुछ बच्चे हैं,
और उनके भविष्य पर
मेरा छोटा-सा विश्वास है।

कभी मैं उन्हें किताब खोलना सिखाता हूँ,
कभी खुद अपनी किताब खोलने की
हिम्मत जुटाता हूँ।
कभी उन्हें समय का मूल्य बताता हूँ,
कभी अपने ही बीते समय से
हिसाब करता हूँ।

मैं कहता हूँ—
“हार मत मानना।”
तो भीतर से आवाज़ आती है—
“तुम भी मत मानना।”

मैं कहता हूँ—
“सीखते रहना।”
तो जीवन मुझे याद दिलाता है—
“तुम्हारा सीखना अभी बाकी है।”

शिष्य मेरे केवल विद्यार्थी नहीं,
मेरे आईने भी हैं;
उनकी जिज्ञासा में
मेरा बचपन दिखाई देता है,
उनकी सफलता में
मेरी साधना मुस्कुराती है।

मैं उन्हें केवल पाठ नहीं पढ़ाता,
मैं खुद भी हर दिन
एक नया पाठ पढ़ता हूँ—
धैर्य का,
संघर्ष का,
असफलता का,
और फिर उठ खड़े होने का।

मंज़िल मेरी भी तय नहीं,
रास्ता अभी बाकी है;
मैं उन्हें आगे बढ़ाते-बढ़ाते
खुद भी आगे बढ़ता जाऊँ—
यही मेरे शिक्षक होने की
सबसे बड़ी कमाई है।

कल वे मुझसे आगे निकल जाएँ,
तो मैं हारूँगा नहीं;
बल्कि उसी दिन समझूँगा—
मेरी मेहनत ने
सही दिशा पकड़ी थी।

क्योंकि शिक्षक वह नहीं
जो स्वयं को सबसे बड़ा समझे,
शिक्षक वह है
जो अपने शिष्यों को
अपने से भी बड़ा देखने का
साहस रखे।

मैं अध्यापक हूँ—
पर आज भी विद्यार्थी हूँ।
मैं सिखाता हूँ—
पर सीखना नहीं छोड़ा।
मेरे हाथ में ज्ञान की मशाल है,
पर मेरी आँखों में
अब भी सीखने की रोशनी है।

और जब तक साँस है,
मैं चलता रहूँगा—
कभी गुरु बनकर,
कभी शिष्य बनकर,
कभी रास्ता दिखाकर,
कभी रास्ता खोजकर...

क्योंकि मेरा परिचय केवल इतना नहीं—
कि मैं बच्चों को पढ़ाता हूँ;
मेरा असली परिचय यह है
कि मैं उनके साथ-साथ
खुद भी पढ़ता हूँ।
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एक घंटा पहले

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