मैं अभी मैं नहीं,
अहंकार का स्वरूप नहीं,
स्वरूप ही नहीं,
मन भी नहीं, अलग भी नहीं।
जो हूँ, वो भी नहीं,
जहाँ हूँ, वहाँ भी नहीं,
तो क्या हूँ मैं?
इसके पार जो ‘हाँ’ है, वो हूँ,
या जो ‘नहीं’ है, वो हूँ?
किसी से कम नहीं!
नहीं का मतलब नहीं!
तो फिर हम सब ‘हाँ’ कैसे?
हाँ में नहीं, नहीं में हाँ,
इसी उलझन में फँसा संसार!
कैसे पता चले—
सत्य ‘हाँ’ है या ‘ना’?
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