एक उम्र ढलती देखी मैंने,
एक इंसान बदलता देखा मैंने।
गुम हुए शौख़ों को
ज़िम्मेदारियों में बदलता देखा मैंने।
जवानी के दिनों को देखा मैंने,
बचपन की याद को याद करके देखा मैंने।
स्कूल की छुट्टी, गर्मी में कुल्फ़ी,
साइकिल की रफ़्तार, बारिश का इंतज़ार।
सब देखा मैंने…
खिलौने की ज़िद देखी मैंने,
घर का सामान देखा मैंने।
देखी मैंने वक़्त की ताक़त,
पहर-पहर में सब का स्वागत।
एक उम्र ढलती देखी मैंने,
एक इंसान बदलता देखा मैंने।
परदेस में गैरों का साथ देखा मैंने,
देश में अपनों का अभिशाप देखा मैंने।
पत्थर में भगवान देखा मैंने…
इंसान में शैतान देखा मैंने।
सब कुछ पाकर देखा मैंने,
सब कुछ खोकर देखा मैंने…
देखा मैंने हर रिश्ता, देखा मैंने हर रस्ता।
वक़्त बदलता देखा मैंने,
क़िस्मत बदलती देखी मैंने…
एक उम्र ढलती देखी मैंने,
एक इंसान बदलता देखा मैंने।
~यश राज मिश्रा
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