मैं अगर आँगन की बात करूँ,
देहरी रह जाएगी।
मैं अगर देहरी की बात करूँ,
घर रह जाएगा।
मैं अगर घर की बात करूँ,
गाँव रह जाएगा।
मैं अगर गाँव की बात करूँ,
ज़िला रह जाएगा।
मैं अगर ज़िले की बात करूँ,
राज्य रह जाएगा।
मैं अगर राज्य की बात करूँ,
देश रह जाएगा।
मैं अगर देश की बात करूँ,
विश्व रह जाएगा।
मैं अगर विश्व की बात करूँ,
इंसान रह जाएगा।
मैं अगर इंसान की बात करूँ,
विचार रह जाएँगे।
मैं अगर विचारों की बात करूँ,
मतभेद रह जाएँगे।
मैं अगर मतभेदों की बात करूँ,
संवाद रह जाएगा।
मैं अगर संवाद की बात करूँ,
समाज रह जाएगा।
मैं अगर समाज की बात करूँ,
इतिहास रह जाएगा।
मैं अगर इतिहास की बात करूँ,
भविष्य रह जाएगा।
मैं अगर भविष्य की बात करूँ,
वर्तमान रह जाएगा।
मैं अगर वर्तमान की बात करूँ,
मैं रह जाऊँगा।
मैं अगर जाति पर लिखूँ,
तो मेरा जातिवाद-विरोध छूट जाएगा।
मैं अगर धर्म पर लिखूँ,
तो मेरी नास्तिकता छूट जाएगी।
जो रह गया है,
वह मैं हूँ।
मैं भारत हूँ।
और जो अब भी रह गया है,
अगर उसकी बात करने बैठूँ,
तो दिन, पहर, रातें और साल
बीत जाएँगे,
पर मेरा कहना कम नहीं होगा।
देश में कमियाँ बहुत हैं,
पर उन्हें गिनाने से पहले
हमें स्वयं को देखना होगा।
पहले हम स्वयं को सुधारेंगे,
फिर देश भी
धीरे-धीरे
सुधर जाएगा।
— यश कुमार कुशवाहा
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