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बचपन और गाँव

                
                                                         
                            क्या मैं सब कुछ भूल गया हूँ
                                                                 
                            
बचपन के उस आँगन को,
जहाँ बैयाँ चला करता था,
माँ के आँचल को,
जिसमें सोया करता था,
पिता के साथ को,
जिससे चलना सीखा था।
क्या मैं सब कुछ भूल गया
उस नीम के पेड़ को,
जिस पर झूला पड़ता था,
खेतों की पगडंडियों को,
जिस पर चलता था।
क्या भूल गया उस बारिश को,
जिसमें भीगा करता था,
बिजली की गड़गड़ाहट
सुन मैं डर जाता था।
दियारे का तालाब,
जिसमें तैरा करता था,
गिल्ली, कंचे और कबड्डी,
जो मैं खेला करता था।
गौरैया की चहचहाहट
सुबह गूँजती थी,
याद आती है वो बाग़,
जिसमें आम चुराया करते थे।
गाँव के वो गलियारे,
दिन भर घूमा करता था,
वो शामें,
जिनमें रोया करता था।
शंकर जी का मंदिर,
जिसमें पूजा करता था,
वो त्योहार जो
सबके साथ मनाते थे।
चूल्हे का वो खाना,
जो शौक से खाता था,
दादी के वो किस्से,
सुंदर सपने लाते थे।
याद आता है वो बचपन,
जो अब लौट के आ नहीं सकता।
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2 घंटे पहले

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