मैं छोड़ उम्मीदें अपनों से,
मैं मुक्त हो करके सपनों से,
निज जीवन का भार उठाता हूं,
मैं स्वयं को श्रेष्ठ बताता हूँ!!
खुद के जैसा न होना ही,
असली दुख का कारण हैं,
अपने मन की न करना,
इसका एक ठोस उदाहरण हैं,
मैं अपने मन के नये गीत को,
गाता हूँ दोहराता हूँ,
मैं स्वयं को श्रेष्ठ बताता हूं!!
- माही
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