ज़र्रा - ज़र्रा ढूँढा मैने मुझे, मुझे मेरा मै नज़र नहीं आता
क्यों किया? क्या जरूरत थी जैसे मेरे सवाल मुझ से नहीं संभालता
लोगों में खुद को ढूंढते हो. खुद से ही खुद का हाल नहीं पूछा जाता
मुझे अब आईना नहीं भाता
अगर बैठूँ तो खड़ा नहीं हो पाता मुझसे नींद छोड़ के जगा नहीं जाता
यादों में यूं उलझा मायूस बैठा हूं मुझसे वर्तमान- भविष्य का अब सोचा नहीं जाता
चार लोग का भी ख्याल नहीं आता। मुझे अब मुझ से नीचे कोई नज़र नहीं आता
मुझे अब आईना नहीं भाता
मेरे कंधे जो बोझहीन है इसे खुद के हित का भार सहा नहीं जाता।
रौशनी तो बोहोत है मेरे दरमियां लेकिन अब खिड़की खोले कौन
मुझे अब धूप में कुछ नज़र नहीं आता
मुझे अब आईना नहीं भाता
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