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ग़ज़ल ...

                
                                                         
                            किताब- ए- इश्क़ का हर्फ़ बन जाऊँ मैं ।
                                                                 
                            
रोज़ अपने लबों पर... सजाते रहना ।।

मैंने खाई है... क़सम रूठ जाने की ।
तुम शाम- ओ- सहर मुझे मनाते रहना ।।

ये मरासिम तो दिल से दिल का है ।
बेशर्त इसे... ताउम्र निभाते रहना ।।

जीते जी करना.. भले ही बेवफ़ाई मुझसे ।
बाद रूख़सती के ताजमहल बनाते रहना ।।

बिजलियाँ हिज्र की गिर जाये मुझ पर ' काज़ी ' ।
ख़्वाब वस्ल के... इन आँखों को दिखाते रहना ।।


---डॉक्टर वासिफ़ काज़ी
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3 वर्ष पहले

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