किताब- ए- इश्क़ का हर्फ़ बन जाऊँ मैं ।
रोज़ अपने लबों पर... सजाते रहना ।।
मैंने खाई है... क़सम रूठ जाने की ।
तुम शाम- ओ- सहर मुझे मनाते रहना ।।
ये मरासिम तो दिल से दिल का है ।
बेशर्त इसे... ताउम्र निभाते रहना ।।
जीते जी करना.. भले ही बेवफ़ाई मुझसे ।
बाद रूख़सती के ताजमहल बनाते रहना ।।
बिजलियाँ हिज्र की गिर जाये मुझ पर ' काज़ी ' ।
ख़्वाब वस्ल के... इन आँखों को दिखाते रहना ।।
---डॉक्टर वासिफ़ काज़ी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X