आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हमने ज़िंदगी नहीं मांगा था मौत मांग रहा हूं कब आएगी बता दे तू हमें

                
                                                         
                            ए ज़िंदगी देने वाले हम ने मांगा तो नहीं था तुझ से अपनी ज़िंदगी
                                                                 
                            
हम नहीं चाहते तेरी दी हुई ज़िंदगी मेरी जिंदगी मज़ाक है जहान में
हो जिसे ख़ूब जीने का इच्छा वह अच्छा समझता है मगर हम नहीं
कौन क्या समझता है हम क्या समझें हमने पाया नहीं वक़्त खोया है
समय का गुजरना दिन महीने वो साल गुज़र जाना ही देखा है फ़क़त
मौत जब आए इसका ईल्म नहीं मुझको अब क्या दिखाना बाकी है
बाकी तू ही रहेगा कायनात में सब कुछ फिना होने के बाद अलगर्ज
जन्म हुई हमारी जन्म नहीं देखा मौत हमारी तू ही देखेगा हम नहीं
हम देखने में हैं तू नहीं मेरे कर्म का लोग मज़ाक उड़ाते मग़र तेरा नहीं
क्या आन बान और शान है तेरा कहीं देखने में नहीं ये शान है तेरा
हम हार गए ख़ुदको तुझे पाने और ढूंढने में मिला कुछ नहीं है मग़र
तेरी मोहताजी में ज़िंदगी मांगा था इंसान का मोहताज बना दिया तूने
दिल नहीं मानता है मेरा बे हया झूठे मक्कार के साथ रहना यहां
हमने ज़िंदगी नहीं मांगा था मौत मांग रहा हूं कब आएगी बता दे तू हमें

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर