आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सूनापन

                
                                                         
                            आशियाना बनाना था जहाँ
                                                                 
                            
सूनापन वहां पसर गया,
शोर मचाता आता था जो कभी
दबे पाँव गली से गुजर गया।
शुमार करता था जो
अपनी सभी बातों में मुझको
छोड़ जाने का फैसला
बस उसने अपनी तरफ लिया।
मौका परस्ती कहूँ इसको
या नये जमाने का असर
अतरंगी कह दुनिया मेरी
सतरंगी रंगों में जा घुल मिल गया।
'तुम कभी बदल ना जाना' कहता था जो कभी,
रफ्ता रफ्ता ख़ुद ही बदल गया।
अब ना जवाब देता कोई,
ना करता दुआओं में शुमार,
दोस्ती का सबक सिखा के उसने,
दुश्मन सा सुलूक किया।
शोर मचाता आता था जो कभी
दबे पाँव गली से गुजर गया।
-नीरू जैन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर