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चांदनी की चिट्ठी

                
                                                         
                            तेरे मन के आँगन में
                                                                 
                            
मैं धूप बन उतर जाऊँ,
तेरी ख़ामोश धड़कनों में
राग बन सँवर जाऊँ।
जो हिज्र के पहर ठहरे हैं
मन की दहलीज़ों पर,
उन्हें प्रेम के पंख दे कर
आज़ाद उड़ना बता जाऊँ।
या तू मिलने आ जाना
नहीं तो मैं मिलने आ जाऊं,
तेरे घर और गलियाँ सूनी सी हैं,
अपनी पायल की छम-छम से
उनमें सरगम सी भर जाऊँ।
तेरी लंबी रातों की
सिसकी लेती चुप्पी में,
मैं चाँदनी की चिट्ठी बन
तेरे मन के आंगन में
धीरे से बिखर जाऊँ।
जो यादों–सवालों की
कड़ियाँ उलझी पड़ी हैं,
उनमें उत्तर की खुशबू बन
मन को महका जाऊँ।
तू शब कहे तो तेरा सवेरा कर
तू पीर कहे तो उसे साज़ कर
तेरे अतरंगी मन को, आज
सतरंगी होली सा रंग जाऊँ।
- नीरू जैन
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5 महीने पहले

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