चाँद की बस्ती
हे पवित्र आत्मा,
तुम्हारी आँखों के बंद होने से,
तुम्हारी गहरी नींद ले जाती हैं
चाँद की बस्ती में, और
इक सितारा बना देती है,
उस जगमगाती दुनिया में।
रह जाती हैं नफ़रतें और तकलीफ़ें पीछे।
नई दुनिया — जहाँ सिर्फ़ प्रेम है,
मिट जाते हैं सारे अंधेरे।
वह कोई भ्रम नहीं —
बल्कि यह दुनिया आत्मा का अवलोकन हैं।
गर नफ़रतों के साए, जमीं पे फैला के गए,
तो रूह टीसती रहेगी।
करुणा बरसाई होगी तो
वहाँ प्रेम तुम्हें देवता बना देगा।
वह रूहानी बस्ती
तुम्हारे ही मन का प्रतिबिंब होगी।
यहाँ तुम्हारी साँसों की लय, बंद होती है,
पर वहाँ की धड़कनें चलती हैं,
इक नया सूरज उगता है,और
उसकी रोशनी तुम्हें उज्ज्वल कर देती है।
सुनाई पड़ती हैं आवाज़ें कई —
कुछ हँसतीं, कुछ रोतीं।
दरअसल, वे तुम्हारे ही कर्मों की गूँज हैं,
तुम्हारी निश्छल प्रार्थना का प्रत्युत्तर।
मिलते हैं फ़रिश्ते कई —
उनकी रहस्यमयी आँखों में जो प्रेम चमकता है,
वह तुम्हारे अपने हृदय का प्रकाश है।
तो समझना —
तुम खोए नहीं, मिले हो;
इस धरती से नहीं, बल्कि
मिले हो अपने शाश्वत स्वरूप से
अनंत विस्तार के साथ,
ईश्वर बाहें फैलाए
समेट लेता है तुम्हें खुद में —
फिर से नया गढ़ने के लिए,
या फिर बसा लेता है
अपनी ही बस्ती में।
और जब तुम
वहाँ सदा के लिए बस जाओगे
तो यह जग भी तुम्हें याद करेगा —
एक रोशनी की तरह,
जो कभी बुझी नहीं।
-नीरू जैन
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