अकेलेपन का गर्व..
मैंने सम्मान दिया खुद को,
कोई ग़म नहीं जो अकेलापन चुना।
भीड़ में रहकर भी खो जाना कैसा,
मैंने अपना ही आत्मीय कोना चुना।
क्यों सहते झूठे लांछन, और
क्यों तन-मन पर वार सहे,
जब दिल दुखाया ही नहीं किसी का
तो खुद के दिल को क्यूँ दर्द दे,
अपनी आत्मा की आवाज़ सुनी
गर्व से खुद के जीने का हक़ चुना।
कोई ग़म नहीं जो अकेलापन चुना,
भले ही वीरान हुईं राहें,
पर मेहरबान रहीं ईश्वर की निगाहें
उसकी छत्रछाया में
तन्हा चलना स्वीकार किया।
कोई ग़म नहीं जो अकेलापन चुना।
झुकी न नज़र, न टूटा जुनून,
राह रोकने कई आए, पर
आगे चले हर ठोकर सह कर
अंतर्मन की लौ जलाकर
अंधेरे का डट के सामना किया।
हाँ, कोई ग़म नहीं जो अकेलापन चुना।
इस एकांत की गोद में
मैंने खुद को फिर से बुना,
खुद को समझा, खुद को सुना,
कोई ग़म नहीं जो अकेलापन चुना।
- नीरू जैन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X