हिंदी हास नहीं,परिहास नहीं,
ना ही किसी की निराशा है।
मैं भारत का रहने वाला हूँ,
हिंदी हमारी मातृभाषा है।
चाहे लाख भाषाएँ रख दो तुम,
पर हिंदी खोज दिखाऊँगा।
लगाकर हृदय से हिंदी को,
मैं भारत माँ के चरणों में झुक जाऊँगा।
यदि खोज न पाया हिंदी को,
तो कैसा भारतवासी वो क्योंकि
हिंदी हमारी मातृभाषा है,
भारत का नहीं निवासी वो।
तरह -तरह की भाषाओं से,
हिंदी को नहीं गिरा पाओगे,
हिंदी तो हमारी मातृभाषा है ,
बिन हिंदी कैसे गिरा गाओगे।
अंग्रेजी ,उर्दु ,गुजराती को,
कभी सामने हिंदी के लाना।
झुककर चरणों में हिंदी के
भाग्य को अपने सराहेंगी।
उठकर चरणों से हिंदी के,
तुम्हें भी आशीष दे जाएँगी।
क्योंकि हिंदी भाषाओं की जननी,
भला कैसे ये टिक पाएंगी।
भारत की संस्कृति हिंदी से,
हिंदी से भारत का सम्मान है।
हिंदी हमारी मातृभाषा है,
यहाँ हिंदी का ही गुणगान है।
हिंदी का रहस्य छुपाकर जो,
परदेसो का गुण गाते हैं,
उनको यह ज्ञात नहीं कि,
हिंदी से भी मनुष्य तर जातें हैं।
इसकी तो विशेषताएँ अनंत,
पर कुछ मै यहाँ सुनाता हूँ ।
हिंदी हमारी मातृभाषा है,
मै हिंदी का ही गुण गाता हूँ ।
हिंदी है भाषाओं की जननी,
हिंदी से मेरा अनुराग है।
मैं भारत का रहने वाला हूँ,
यहाँ हिंदी का ही गुणगान है।
अंधे को भी दिख जाती है,
ऐसी सूरत है हिंदी की ।
बहरा भी श्रवण कर जाता है,
ऐसी राग है हिंदी की।
लंगड़ा भी पर्वत लाँग जाता है,
जब सुनता है हिंदी की राग।
गूंगा भी बोल उठता है,
भरा है ऐसा हिंदी में अनुराग।
अब हिंदी के चरणों मे झुककर,
इसको ह्रदय से लगाता हूँ।
हिंदी हमारी मातृभाषा है,
हिंदी का ही गुण गाता हूँ ।
इस पवित्र भाषा हिंदी को,
अनंत काल तक मेरा सम्मान है।
हिंदी हमारी मातृभाषा है
यहाँ हिंदी का ही गुणगान है।
यहाँ हिंदी का ही गुणगान है
सर्वेश कुमार
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