उन्मादों का शोर अकिंचन,
बिना रात के भोर अकिंचन,
राह बिना चलते जाना है,
हर ख्वाबों पर जोर अकिंचन।
सपनों की गरिमा नयनों से,
साधक पूर्ण हुआ चयनों से,
रथ के पहिए धंसे भले पर,
युद्ध तो तय है स्व-वचनों से।
मस्तक पर हो विजय-तिलक या,
अंगों पर लोहित की धारा,
वही पुरुष जो अड़िग खड़ा है,
जिसने कभी न भाग्य पुकारा।
पौरुष की पावक ज्वाला से,
किस्मत का हर लेख जलेगा,
शून्य खड़ा जो सिंह सरीखा,
वही नियति का चक्र छलेगा।
समर शेष है, शपथ शेष है,
अंतिम रण का वेश शेष है,
कायर सोयें ओढ़ नियति को,
मुझमें जगता प्रलय-वेश है।
टूटें पर्वत, थमें दिशाएं,
पर ना डगमग कदम हमारे
अब की मन वो वज्र बनेगा,
जिसके सम्मुख काल भी हारे।
हटो व्योम के मेघ-खंड तुम,
आज गरजने दो इस मन को,
कर्ण सदृश वह अडिग खड़ा है
दे रहा है चुनौती त्रिभुवन को
भुजा फड़कती, रक्त उबलता,
शेष न कोई बंधन है
जगी चेतना, बिगुल बजा के
हर रण जीवन मंथन है।।
-विश्वास प्रधान
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