कोई इतना व्याकुल कैसे कर सकता है,
कर सकता है लेकिन घर कैसे कर सकता है,
अभी मोहब्बत के लफ्ज़ बयानों में उतरे भी नहीं है,
बस हया और सलूक से अपना कैसे कर सकता है।
मै कैसे खुद को हल्का करूं वो तो मेरे चश्मे-तर में है,
यारों में सुर्खियां उसी से है और उसके खोने का डर भी मुझमें है,
मुमकिन है कि बेख़बर हो कि मेरे दिल के तह में क्या है,
गिरे हर रोज मुझपर शबनम की तरह निखरे जब मेरा नूर हों।
-विष्णु नेह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X