मैं कितना असहाय महसूस कर रहा हूं,की
प्रेम के दो शब्द नहीं बोल पाया,
एक स्नेहिल फूल नहीं दे पाया,
साथ तो चला मगर हमसफ़र नहीं बन पाया ,
तुम्हारे सुंदर तन- मन का एहसास तुम्हें ही नहीं दिला पाया,
कितना तुच्छ हूं और कितना अभागा हूं कि ,
तुम्हारे भाव से जन्म लेती कविता का पाठ तुम्हें ही नहीं सुना पाया,
जताया यकीन कई दफा तुमने उस क्षण शब्दों में छिपे भाव नहीं समझ पाया ।
तुम्हारी मौजूदगी में इतराता रहा ,
जो चली गई हो दूर तब फिसल रही रेत ना रोक पाने पर मुट्ठी की असमर्थता पर दिल घबराता रहा ।
एक ही कर्म भूमि और कार्यक्षेत्र से जुड़े होते हुए हम बात करते-करते चुप हो जाते हैं या चुप हो जाते थे,
न जाने कौन मुझको लिखने से रोक देता था तुम्हें पढ़ने से,
और तुम्हें लिखने से रोक देता था मुझे पढ़ने से ।
एक गहरा संबंधों का पौधा निश्चित ही अंकुरित हो रखा है,
खामोशी की चोट से सूखते पौधे की विवशता पर उधर तुम्हें और इधर मुझे बहुत व्याकुल कर रखा है,
मेरी व्याकुलता मुझे स्थिर नहीं रखती तुम्हारी यादों से सजे घर की बुनियाद इतनी सुदृढ़ हो चुकी है कि किसी और की एक ईंट ना रख पाऊंगा ।
सफेद हो रही दाढ़ी को देखते हुए याद आता वक्त ,
सब कुछ पीछे छूट जाने का डर ,
तुमको खो देने का डर ,
अप्रत्याशित भविष्य का डर,
मेरे आत्म विश्वास को रोज खोखला करता रहा ।
प्रेम धागे को उसूलों पर बांधने की कोशिश में मुझे इतना असफल कर रखा है, की
जीवन की सार्थकता झूठी लगने लगी है ।
मेरा निश्चल व्यवहार , तुम्हारा स्वाभिमान, सीमित संवाद मेरे और तुम्हारे भीतर कितना कुछ अनकहा और अनसुना छोड़ रखा है ।
दुनिया इतनी खूबसूरत होते हुए तुम्हारे बगैर कुछ देखने का साहस न रहा ,
सब कुछ त्यागने का ख्याल रोज मेरे अंदर उबलता रहा ।
तुम सामान्य नहीं हो तुम्हारे असाधारण व्यक्तित्व का खिंचाव इतना सबल है कि मैं निरुत्तर रहता हूं ,
इधर तुमको पाने की कोशिश में मैं खुद से दूर हो रखा हूं ।
उधर मां की कमजोर होती हड्डियां में पुत्र कर्तव्य का पालन मुझे मेरे स्वयं के अस्तित्व को सार्थक करने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है। मैं जानता हूं ,मृत्यु के सत्य होने पर हम सभी का अंत में मिलन आकाश में नहीं तो निश्चित ही इस मिट्टी में होगा ।
तब तक क्या प्रेम हम दोनों के बीच ऐसे ही विवश होगा ?
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