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इक मर्तबा का मुसाफा

                
                                                         
                            घर हो, फुर्सत हो, बाहर-ए- सान में दरख्त-ए-आम हो,
                                                                 
                            
तृषित ज़मीं बुझाने यकायक बरखा झोंके पवन के साथ हो,
इक मर्तबा का मुसाफा, गाहे- गाहे का मुकालमा, बारिश तुम्हारा नाम, क्यों न याद हो,
तेरी खुद्दारी , मेरी तरबियत , चलों करें इनमें सेंधमारी और फिर नया आगाज़ हो।
नहीं है खतावार हममें कोई , फिर क्यों ख़ामोशी का असर हो,
न वो शहर हो , न मासूम पहर हो ,
तुम रहो बस मेरे साथ और निर्मल गंगा जी का तट हो ।

 
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2 महीने पहले

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