कुछ दिन बिताओगे ,चले जाओगे,
तुम ज़हीन हो, ज़ेहनियत बतलाओगे चले जाओगे,
हम तो पेड़ होने का मायने भी नहीं जानते हैं,
तुम एक-एक पत्ता उतारोगे चले जाओगे।
रोज़ याद आते हो? हां, रोज़ याद आओगे,
ऐसे ही तड़पाते हो? हां, रोज़ तड़पाओगे,
कुछ लम्हों की इक जवानी है हमारी,
इक लम्हे में सारी जवानी चुराओगे ,चले जाओगे।
मैं रुठी रहूंगी , आने वाली हर ऋतुओं में,
क्या तुम कोई मौसम मनाओगे? नहीं, चले जाओगे,
इन पक्षियों का बसेरा आंधियों से उजड़ा है ,
तुम मिजाज-ए-मौसम बतलाओगे, चले जाओगे ।
वो अफसाना जिसका आगाज हमसे हैं ,
अंजाम-ए-दास्तां सुनाओगे, चले जाओगे ,
अब इस सूखे पेड़ की छांव में कौन बैठेगा?
तुम अब सर्दियों में कुछ-कुछ जलाओगे, चलें जाओगे।
-विष्णु नेह
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