कुछ पवित्र भाव जो किरदारों के कंठ भीतर शोभित रहें,
योग - वियोग देखा और मौन वाणी करके अनुग्रहीत रहे,
मेरे अंतहीन अवकाश तक मर्यादा यहां प्रतीक्षारत रहे,
औपचारिकता ही सही परन्तु प्रेम सदैव निवेशित रहे,
हम अल्पज्ञ , अभिनय के किरदार, कैसे कहानी पूर्ण हो ?
नेपथ्य में जो निर्मल रच रहा है, वो निष्ठुर है यहां।
तुम्हारी स्मृति ही वस्तुनिष्ठता है मनोभावों की ,
व्याकुलता के पहिए तले अर्थहीन हो रहे सभी भाव यहां,
ऋजु रेखा समान प्रेम वक्र पूर्ण जीवन का मूल है,
मूल्य के महत्वहीन आयाम पर अपरिभाषित है जीवन यहां ।
- विष्णु नेह
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