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शून्य से शिखर

                
                                                         
                            परिस्थितियां बदल जाती हैं, बस बदल देने वाला चाहिए। जीत की खातिर सब कुछ, कर देने का हौसला रखने वाला चाहिए।
                                                                 
                            
मंजिल का मिलना हो सकता है कठिन, पर नामुमकिन सर्वथा नहीं होता। कह सकते हैं किसी काम को कठिन, पर वह असंभव तो नहीं होता।
माना कि तम के दीपक बुझे हुए हैं, और घनी अंधेरी रात है, माना कि टपक रहा है लहू बदन से, पर अभी भी तुम्हारे प्राण तुम्हारे पास हैं।
माना कि ढह चुका है तेरा घर, मगर अभी भी सारा जहाँ बाकी है, तू नत नूतन निकेतन बना, तू अपने आप को सिकंदर बना।
तू आज शून्य है, तू शून्य से खुद को सहस्र बना , जीत मिलेगी तुझको, पर तू अपने आप को जीत के लायक बना!!!
-विशाल कुमार वर्मा
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