मिला ना कुछ, बस आँखों में आँसू के सिवा,
हम तो न जाने कितने ख़्वाब सजाए बैठे थे।
वो हमें छोड़कर यूँ चले गए,
और हम उन्हें अपना समझकर उम्मीदें लगाए बैठे थे।
धोखा दिया था, पर उन्हें अपनी गलती कभी दिखाई नहीं दी,
हर बात पर उन्होंने एक नई कहानी गढ़ दी।
मानने को कभी राज़ी न हुए अपनी गलतियाँ,
हर इल्ज़ाम की वजह बस मुझे ही बना दिया।
सच मेरे साथ था, फिर भी मैं ही कटघरे में खड़ा रहा,
और वो हर बार खुद को बेगुनाह बताते रहे।
दर्द इतना हुआ कि दर्द को भी रोना आ गया,
उनके झूठ के बादलों में मेरा सच का आसमान खो गया।
खेल तो उन्होंने बड़ी ख़ूबसूरती से खेला,
और हर बार मुझे ही गुनहगार ठहरा दिया।
सच की आवाज़ दब गई उनके झूठ के शोर में,
मैं हार गया और रिश्तों पर से भरोसा खो गया।
कोई नहीं होता है..." कहकर दिल ने हर बार उसे माफ़ किया,
हर ज़ख्म को चुपचाप अपने सीने में दफ़्न किया।
मगर ज़ालिमों को मोहब्बत का मतलब कौन समझाए,
जिन्होंने हर सच्चे जज़्बात को बस एक खेल समझा।
हमने तो वफ़ा निभाई आख़िरी साँस तक,
और उन्होंने उसे हमारी मजबूरी समझ लिया।
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