मुश्किलों से कब डरे है
जीत की हुंकार निश्चित
जोर कितना भी लगा लो
नाव होगी पार निश्चित
जान जितनी है लगा दो
आप की है हार निश्चित
जान जाए गम नहीं है
ज़िंदगी तैयार निश्चित
प्रेत मेरा भी लड़ेगा
मौत का त्योहार निश्चित
आग खुद को हम लगा ले
हर जलेगा द्वार निश्चित
-विनोद गणेशपुरे
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