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पापा, जिनमें हमारी जान बसती है।

                
                                                         
                            पापा, जिनमें हमारी जान बसती है।
                                                                 
                            
जिनके कंधों पर बैठकर ही तो हमने बचपन में सारा जहाँ देखा है।

जिन्हें हर वक्त हमारी फ़िक्र सताती है।
जिन्हें हमारा हाल-ए-दिल बिना कहे ही पता होता है।

जो चुप रहकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं।
पापा, घर देर से पहुँचने पर हमारे घर वापस आने तक की पूरी फ़िक्र जिन्हें सताती रहती है।

जिन्होंने बचपन से लेकर आज तक हमारी हर छोटी-से-छोटी ज़रूरत पूरी की है। जिन्होंने घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ बड़ी ही बेहतरीन तरह से निभाई हैं।

पापा, जिनकी डाँट सुनकर ही तो हम बड़े हुए हैं। और सच कहूँ तो, पापा की वो डाँट भी हमें बहुत अच्छी लगती है।

 
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एक घंटा पहले

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