आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

यूँ तो कोई फ़ज़ीहत भी न हो, और कोई गिला भी बाक़ी न रहे।

                
                                                         
                            ख़ुदा का नूर इतना हो कि हर तमन्ना उसकी पूरी हो,
                                                                 
                            
कभी किसी राज़ में दफ़्न कोई बात ना हो।
हर रज़ा में एक नाम बस तेरा हो,
इक़रार भी न हो, इज़हार भी न हो।

ख़ुदा गवाह हो उस मंज़र का,
जहाँ न कोई तलब बाक़ी हो,
न ही किसी से कोई शिकवा हो।
जहाँ सिर्फ़ मोहब्बत हो चारों तरफ़,
और खैरियत पूछने वाला कोई तो हो।

इत्तेफ़ाक़न कोई गैर न समझ सके मुझे,
मैं तो साज़ में छिपा कोई हर्फ़-सा लगूँ।
बस, जो मेरे हिस्से का है, वो मुझे ही मिले,
यूँ तो कोई फ़ज़ीहत भी न हो, और कोई गिला भी बाक़ी न रहे।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर