सुंदर सी है मेरी बगिया,
आँखों को देती ठंडक सी,
रोम-रोम में जादू जगाए,
मन को देती राहत सी।
रंग-बिरंगे फूल मुझे,
अपनी ओर बुलाते हैं,
हवा से हिलती बेलें इनकी,
मन को गुदगुदाते हैं।
मेरी बगिया के फूलों के,
रंग इतने सारे हैं,
यूँ कहूँ तो मेघधनुष
के रंगों से भी निराले हैं।
इनके रंग हमेशा मुझे,
अपनी ओर रिझाते हैं,
निराशा से भरे मेरे मन को,
आशा के रंगों से भर जाते हैं।
छोटी सी कली, उम्मीद की,
हर रोज़ किरण जगाती है,
देर हो रही खिलने में पर,
खिले हुए फूलों संग,
वो भी खुलकर इठलाती है।
थक कर जब मैं खाली बैठूँ,
बातें इनसे करती हूँ,
मेरी प्यारी सी बगिया पर,
मैं अपनी जान छिड़कती हूँ।
-विनीता कर्मशील
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