मेरे घर के हर कण में
इस तरह बस गयी हो तुम
कि यह दीवार, सहन, ये दरवाजे
मेरी जागीर का हर कोना
हर पल आवाज देते हैं तुम्हें।
कभी तुम हवाओं के संग
खुशबू बन आना
कभी धूप का टुकड़ा बन मुस्कराना
और धीरे से
मेरे पहलू में बैठ जाना
अपनी सांसों की गर्मी से मुझे चौका जाना।
जब भी आवाज दें तुम्हे ये कमरे
ये दरवाजे यह दीवार
तुम बयार बन आना
कभी चाँद बन मुस्कराना
और चाँदनी बन मेरे छत पर उतर आना,
लेकिन जब भी आना
धीरे से आना,
ओ धूप की सोनकिरण
तुम जब भी मेरे शहर आना
बिन बुलाये मेरे घर आना
जरूर आना।
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