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मैं मानता हूँ खुदा को

                
                                                         
                            मुझे मेरी हँसी नज़र नहीं आती।
                                                                 
                            
मुझे मेरे आँसुओं को रोकना नहीं आता।
मैं चलता हूँ जिस रास्ते पर।
वहाँ कोई मंजर नहीं आता।
मैंने पहाड़ देखें हैं।
मैंने नदियाँ देखी हैं।
मैं नहीं जानता ये दुनियां।
मग़र मैंने ख़ुदा की कारीगरी देखी है।
मैं मानता हूँ खुदा को।
मैं लिखता हूँ खुदा को।
मुझमें समझदारी कई सदियों के बाद दिखी है।
मैं भी सबकी तरह शैतान था।
खुदकी दुनियां में एक एहसान था।
मेरा कोई तोड़ नहीं।
कहता पूरा ज़माना था।
मैं टूटा हूँ अंदर ही अंदर।
बाहर से और मजबूत नज़र आया हूँ।
कोई कैसे मान लेता, कि मैं चकना चूर हुआ हूँ।
अंजान, अंजाम से, मैं बेवक़ूफ़ ही रहा हूँ।
मुझे ख़ुदा ने ही संभाला है, इंसानों की तक़दीर में, मैं कहां हूँ?
मैं रोया दिन, रात, खून के आँसू रोया हूँ।
मुझ पर कोई दया नहीं दिखाई किसीने।
खुदा का, जो मैं बंदा हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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