मेरी इस बेहोशी को, ज़िंदगी की ताक़त तो दे।
मेरी इस बेचैनी को कुछ राहत तो दे।
मैं मगरूर हो चुका हूँ खुद में, मुझे ज़माने में रहने की इजाज़त तो दे।
कुछ नया बनाने की मोहोलत तो दे।
मुझे समुंदर में तैरने की नहीं, तो कम से कम डूबने की इजाज़त तो दे।
है किसीके साथ की जरूरत या नहीं, मुझे ऐहसास तो दे।
मैं बना हूँ मौम का, या पत्थर का, कुछ तो समझा दे।
मैं हूँ चीज़ कोई नायाब या, कचरे की तरह ही है मेरी औकात, कुछ तो बता दे।
तु सिक्का उछाल और मेरी क़िस्मत तो देख।
कुछ बवाल तो कर, ज़िंदगी में कुछ माहोल तो कर दे।
लिखदे मुझे इन पत्थरों पर, या मुझे इंक़लाब कर दे।
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