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और तू ग़ैरों की महफ़िल में हँसकर सँवर गया

                
                                                         
                            ठोकर क्या मारी तुमने मेरे प्यार को,
                                                                 
                            
छोटा सा घरौंदा था; तिनके सा बिखर गया।
जिस दिल में बसाया था कभी आशियाना तेरा,
वो आज दर्द के साए में कतरा-कतरा बिखर गया।
हम तो चराग़ बनकर जले थे तेरी राहों में,
तू हवा बनकर आया और सब कुछ बुझा कर चला गया।
माँगी थी रब से दुआ बस तेरी ही खुशी की,
तू ही मेरी हर एक मन्नत को अधूरा छोड़ गया।
अब तो इन आँसुओं का भी कोई मोल न रहा,
जब से तू मेरी आँखों का साहिल छोड़ गया।
तड़पते रहे हम रात भर तेरी यादों की आग में,
और तू ग़ैरों की महफ़िल में हँसकर सँवर गया।
 — विकास त्रिपाठी 'विक्की'
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51 मिनट पहले

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