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पुराने ख़त

                
                                                         
                            मोहब्बत को मेरी इस क़दर महफ़ूज़ रखना तुम,
                                                                 
                            
कुछ पुराने ख़तों को मेरे सँभालकर रखना तुम।

जो बातें कभी लबों तक आ न सकीं मेरे,
उन बातों को उन ख़तों में सँवारकर रखना तुम।

वक़्त बदले, मौसम बदले, बदल जाए ज़माना,
मेरी यादों को मगर दिल में बहालकर रखना तुम।

कभी तन्हाई में आँखों से नींद रूठ जाए,
मेरे ख़तों को सीने से लगा कर रखना तुम।

जो अश्क गिरें उन काग़ज़ों पर पढ़ते-पढ़ते,
उन्हें मेरी मोहब्बत का इज़हार समझना तुम।

मैं दूर रहूँ तो क्या, मेरी ख़ुशबू रहेगी उनमें,
उन पन्नों को कभी दिल से निकालना मत तुम।

मेरी हर अधूरी बात का जवाब ढूँढना उनमें,
मेरी ख़ामोशी को भी एक पुकार समझना तुम।

मुमकिन है किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात हो जाए,
तब तक मेरे इंतज़ार को सँभालकर रखना तुम।

मैं लौटूँ या न लौटूँ, ये मुक़द्दर की बात है,
बस मेरी मोहब्बत को दिल में बरक़रार रखना तुम।

और जब कभी कोई पूछे मेरी कहानी तुमसे,
बस मुस्कुराकर कहना—वो शख़्स ख़ास था...
जिसके कुछ ख़त आज भी मेरे पास हैं।
- विकास त्रिपाठी 'विक्की'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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