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पत्थर से हीरा

                
                                                         
                            राह का पत्थर था मैं, ठोकरें खा रहा था दर-बदर,
                                                                 
                            
तराश के तुमने मुझे, हीरा बना दिया।
खो गया था मैं दुनिया की बदगुमानी में कहीं,
प्यार देकर अपना, तुमने मुझे जीना सिखा दिया।
धुंधली सी थी जो रातें, बेनूर से थे ख़्वाब मेरे,
ज़ुल्फ़ों को अपनी गिरा के, तुमने उजाला बना दिया।
सूखे हुए दरख़्त सा खड़ा था मैं राहों में,
छूकर अपनी साँसों से, मुझको गुलसिताँ बना दिया।
तन्हाइयों का डर था, जो साए की तरह साथ चला,
थाम के हाथ मेरा, तुमने उसे अफ़साना बना दिया।
लफ़्ज़ थे बिखरे-बिखरे, कोई तरन्नुम न थी जिनमें,
छेड़ कर दिल के तार, तुमने मीठा नग्मा बना दिया।
ख़ामोश थे लब मेरे, सीने में दबे थे कई दर्द,
नज़रों से नज़रें मिलाकर, तुमने फ़साना बना दिया।
भटकता फिरा था मैं, मंज़िल की तलाश में बरसों,
अपने आग़ोश को ही, तुमने मेरा आसरा बना दिया।
बे-नाम सा मुसाफ़िर था मैं, इस भीड़-भाड़ में कहीं,
अपनी चाहत का रंग चढ़ाकर, मुझे ख़ास बना दिया।
अब न कोई तमन्ना है, न कोई शिकवा ज़माने से,
अपनी इबादत में ढाल के, तुमने मुझे खुदा का सरमाया बना दिया।
-विकास त्रिपाठी 
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2 महीने पहले

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