मोहब्बत की आज़माइश बाकी है,
दिल में दबी अभी कोई ख़्वाहिश बाकी है।
फ़ासले तो बढ़ गए दोनों के दरमियाँ,
पर सीने में सुलगती वही आतिश बाकी है।
वो बेवफ़ा होकर भी याद आता है क्यों,
लगता है शायद कोई गुंजाइश बाकी है।
वो राहों में तन्हा छोड़कर चला गया,
आँखों में मगर मिलने की फ़रमाइश बाकी है।
ज़ख़्म जितने दिए उसने, सब मंज़ूर हैं मुझे,
शायद अभी सितम की नुमाइश बाकी है।
काली रात ढलती नहीं हिज्र की अब तक,
लगता है सुबह से कोई रंजिश बाकी है।
सब कुछ लुटा दिया हमने उसकी राहों में,
फिर भी दिल में कोई गुज़ारिश बाकी है।
उसकी बेरुख़ी ने तोड़ा दिल कई दफ़ा,
फिर भी वफ़ा की एक रिवायत बाकी है।
उसके जाने के बाद भी बदले नहीं हम,
लगता है ख़ुदा की अभी तराश बाकी है।
ज़िंदगी ठहर गई उसी मोड़ पर आकर,
दर्द-ए-दिल की अभी पूरी आज़माइश बाकी है।
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