आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मोहब्बत का बाज़ार

                
                                                         
                            उसे नफ़रत का शोर मचाने दो,
                                                                 
                            
हम मोहब्बत का बाज़ार लगाए बैठे हैं।

उसे हमें नज़रों से गिराने दो,
हम उसकी एक झलक के इंतज़ार में सदियाँ बिताए बैठे हैं।

वो चाहे हर मोड़ पर हमें ठुकराता रहे,
हम हर मोड़ पर उसकी राह सजाए बैठे हैं।

उसे यक़ीं है कि बदल जाएगा हमारा दिल,
हम उम्रभर की वफ़ा का इकरार किए बैठे हैं।

वो गैरों की महफ़िल में हमें भूल भी जाए,
हम उसके नाम से अपनी हर शाम सजाए बैठे हैं।

उसने नफ़रत को अपना उसूल बना लिया,
हम मोहब्बत को अपना ईमान बनाए बैठे हैं।

वो हमें हार की कहानी समझता रहा,
हम उसकी हर जीत पर भी मुस्कुराए बैठे हैं।

कौन कहता है इश्क़ का कोई बाज़ार नहीं होता,
हम अपना दिल बिना किसी मोल लगाए बैठे हैं।

जिस दिन उसे एहसास होगा हमारी चाहत का,
शायद तब तक हम ख़ामोशियों को गले लगाए बैठे होंगे।

अगर मोहब्बत गुनाह है, तो ये गुनाह बार-बार करेंगे,
क्योंकि हम इश्क़ में अपनी पूरी दुनिया लुटाए बैठे हैं।
- विकास त्रिपाठी 'विक्की'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर