हर किसी के बस की बात नहीं,
कलम से ज़माने का मिज़ाज लिखना।
जो झूठ के दरबार में भी,
सच को बेख़ौफ़ आवाज़ लिखना।
स्याही अगर ईमान से मिल जाए,
तो हर लफ़्ज़ इंक़लाब बन जाता है।
कलम उसी की अमर होती है,
जो इंसान को इंसान लिखना जानता है।
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