मातृभाषा से कुछ ऐसा दिल लगाया मैंने,
हिन्दी को महबूब-ए-वतन बनाया मैंने।
माँ की लोरी-सी इसकी मिठास है मन में,
हर इक अक्षर को दिल में सजाया मैंने।
इसकी बोली में संस्कारों की खुशबू है,
हर शब्द में अपना गौरव पाया मैंने।
तुलसी की भक्ति, कबीर की वाणी है इसमें,
संतों के संदेश को दिल से अपनाया मैंने।
दुनिया की हर भाषा का सम्मान किया लेकिन,
हिन्दी को अपने माथे का ताज बनाया मैंने।
जब भी कलम चली, हिन्दी ही साथ रही,
हर भाव को हिन्दी में ही गुनगुनाया मैंने।
ये केवल भाषा नहीं, मेरी पहचान है,
इसके सम्मान को अपना धर्म बनाया मैंने।
जब तक साँस रहेगी, हिन्दी का मान रहे,
इसके प्रेम को जीवन भर निभाया मैंने।
मातृभाषा का प्रेम यूँ ही नहीं है मुझको,
हिन्दी को अपनी धड़कन बनाया मैंने।
— विकास त्रिपाठी ‘विक्की’
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